Poem in Hindi by Reshma Ekka

यूँ ही एक शाम चलते चलते
नदी के किनारे आकर कदम रुकने गए
आज मन ने कहा चलो
इन्हीं से कुछ बातें करते हैं
जो कुछ ना कह कर भी
ना जाने कितनी ही बातें करतीं हैं
निरंतर बहती है,,, 
सोचती हूँ एक बूंद भी अगर बहना छोड़ दे
तो क्या अस्तित्व रहेगा?
इस निरंतर नदी का,,, 
बूंदों ने तो इसका स्वरूप ही बदल दिया।
लौट कर पहाडो़ की तरफ़ बढने लगे कदम
रंग बिरंगे सुंदर मनमोहक फूलों से लदी घाटियाँ,,, 
फिर से मेरा अंतर्मन सोचने लगा 
क्या इन टेढ़ी मेढ़ी पहाडियों की खुबसूरती
इन जंगली फूलों के बिना होती? 
घाटियाँ इन् फूलों से सजी हुई है।
अब चलते चलते मैनें देखा
दूर तक लहलहाती फसलों को,,, 
क्या मिट्टी के कण के बिना
इन फसलों की उपज संभव है?
अंततः मेरी कल्पना और प्रकृति के मध्य संवाद ने
मुझे यही संदेश दिया,,, 
सारी सृष्टि में एकता है।
पानी के एक बूंद के बिना
समुद्र की अथाह गहराई नहीं,,, 
मिट्टी के कण के बिना
संपूर्ण धरा का असतित्व नहीं।
हमारी सभय्ता संस्कृति ही हमारी पहचान है
जल जंगल ज़मीन यही हम आदिवासियों की शान है।