Poem in Hindi by Dr Megha Bhengra

दो अलग अलग जिदंगियां थी हमारी
तुम किसी छोर में और मैं किसी ओर
एक दूसरे के वजूद की थी न जानकारी 
बस जी थे रहे न थी हमारे बीच कोई डोर
हम कब इतने घुलमिल गए पता ही न चला
समय ने इम्तिहान ली तब इसका एहसास हुआ
शुक्रिया करूं खुदा का इतना अहम साथी जो मिला 
जब दूरी व देरी मिले साथ बची बस हमारी दुआ
एक बात बताऊं याद तो तुम्हारी बोहत आती है
बस देखो यह इंतजार की घड़ी कब जाती है

रोज सुबह उठते ही तुम्हारी याद बोहत आती है
जैसे मुस्कराते हुए नये दिन पर स्वागत कर रहे
तो कभी तुम्हारे हाथों की बनी चाय याद आती है
कभी स्नेह भरी आवाज से मानो अब उठो बोल रहे
फोन पे जितने तस्वीरें हैं सब संजो संजो कर रखी है
जब याद आते उन कैद पलों को फिर से जी लेती हूं
अब  रोज बातों में बिताए हुए पल मेरी न‌यी सखी है
हर दिन के अनमोल पलों को संभाल कर रख लेती हूं
एक बात बताऊं याद तो तुम्हारी बोहत आती है
बस देखो यह इंतजार की घड़ी कब जाती है

खाने की मेज़ पर लगता कि काश तुम सामने मेरे होते
ख्याल आते कि आज तुमने ठीक से खाया तो होगा ना
अकेलेपन में लगता काश अभी तो तुम मेरे पास होते
फिर सोचती तुम भी तो सब अकेले संभाल रहे हो ना
बैचैन हो उठती हूं जब तुम्हारी तबियत सही नहीं होती
कमी खलती है तुम्हारी जब मुझे अच्छा नहीं लगता 
दूर हूं क्या करूं नहीं तो पास में इतनी चिंता नहीं होती
बस कुछ और दिन बस कुछ और अब यही है लगता 
एक बात बताऊं याद तो तुम्हारी बोहत आती है
बस देखो यह इंतजार की घड़ी कब जाती है

– डॉ मेघा भैंगरा